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स्कूल शिक्षा का भविष्य

स्कूल शिक्षा का भविष्य तकनीकी विकास, सामाजिक परिवर्तनों और वैश्विक बदलावों के कारण बहुत ही रोमांचक और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। कुछ प्रमुख बदलाव जो आने वाले समय में हो सकते हैं, वे इस प्रकार हैं: प्रौद्योगिकी का उपयोग : डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन शिक्षा, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का स्कूल शिक्षा में एक महत्वपूर्ण स्थान होगा। बच्चों को इंटरेक्टिव, कस्टमाइज्ड और पर्सनलाइज्ड शिक्षा मिल सकेगी। स्मार्ट क्लासरूम, ई-लर्निंग, और आभासी कक्षाएं एक सामान्य तरीका बन सकती हैं। कौशल आधारित शिक्षा : भविष्य में शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यावसायिक कौशल, समस्या सुलझाने की क्षमता, और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देना होगा। ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किए जाएंगे जो जीवन कौशल, संवाद कौशल, और प्रौद्योगिकियों के बारे में गहरे ज्ञान को शामिल करेंगे। समावेशी और व्यक्तिगत शिक्षा : शिक्षा में विविधता और समावेशिता पर जोर दिया जाएगा, ताकि सभी छात्रों को उनकी क्षमता के अनुसार शिक्षा मिल सके। इससे बच्चों के शैक्षिक और मानसिक विकास में मदद मिलेगी, चाहे वे किसी भी सामाजिक या भौगोलिक पृष्...

गद्यकाव्य

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गद्यकाव्य 'गद्यकाव्य' गद्य की ऐसी विधा है, जिसमें कविता जैसी रसमयता,  रमणीयता, चित्रात्मकता और संवेदनशीलता होती है । हिंदी में रायकृष्णदास गद्यकाव्य के जनक माने जाते हैं।इन्होंने अनेक आध्यात्मिक गद्यकाव्यों की रचना की। गद्यकाव्य की सर्वप्रथम रचना रामाकृष्णदास की 'साधना' (1916 ई) है।  साधना, संलाप, प्रवाल, छायावाद आदि रामाकृष्ण दास के मुख्य गद्यकाव्य संग्रह है। गद्यकाव्य, रचना की प्रणाम रवींद्रनाथ टैगोर की 'गीतांजलि' के हिंदी अनुवाद से प्राप्त हुई। गद्यकाव्य का क्रमबद्ध लेखन छायावाद युग से आरंभ होता है और छायावाद युग में ही पूर्ण विकास लक्षित होता है। कुछ आलोचकों ने भारतेंदु को ही इस विधा का जनक माना है। प्रेमघन जगमोहन सिंह आदि भारतेंदु के सहयोगियों की रचनाओं में गद्यकाव्य की झलक मिलती है। बृजनंदन सहाय के 'सौन्दर्योपासक' को हिंदी का प्रथम गद्य काव्य माना जाता है। राजा राधिकारमण प्रसाद ने 'प्रेमलहरी' तथा लक्ष्मी-नारायण सिंह 'सुधांशु' ने 'वियोग' नामक गद्यकाव्य की रचना की।  वियोगीहरि के गद्यकाव्यों में 'भक्तितत्व' ...

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