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स्कूल शिक्षा का भविष्य

स्कूल शिक्षा का भविष्य तकनीकी विकास, सामाजिक परिवर्तनों और वैश्विक बदलावों के कारण बहुत ही रोमांचक और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। कुछ प्रमुख बदलाव जो आने वाले समय में हो सकते हैं, वे इस प्रकार हैं: प्रौद्योगिकी का उपयोग : डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन शिक्षा, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का स्कूल शिक्षा में एक महत्वपूर्ण स्थान होगा। बच्चों को इंटरेक्टिव, कस्टमाइज्ड और पर्सनलाइज्ड शिक्षा मिल सकेगी। स्मार्ट क्लासरूम, ई-लर्निंग, और आभासी कक्षाएं एक सामान्य तरीका बन सकती हैं। कौशल आधारित शिक्षा : भविष्य में शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यावसायिक कौशल, समस्या सुलझाने की क्षमता, और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देना होगा। ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किए जाएंगे जो जीवन कौशल, संवाद कौशल, और प्रौद्योगिकियों के बारे में गहरे ज्ञान को शामिल करेंगे। समावेशी और व्यक्तिगत शिक्षा : शिक्षा में विविधता और समावेशिता पर जोर दिया जाएगा, ताकि सभी छात्रों को उनकी क्षमता के अनुसार शिक्षा मिल सके। इससे बच्चों के शैक्षिक और मानसिक विकास में मदद मिलेगी, चाहे वे किसी भी सामाजिक या भौगोलिक पृष्...

हिंदी भाषा का महत्व

विश्व में अंग्रेज़ी और चीनी  के बाद हिंदी दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी  भारत की आधिकारिक भाषा और राजभाषा है। हिंदी नेपाल, मॉरीशस और फिजी जैसे अन्य देशों में व्यापक रूप से बोली जाती है। हिंदी श्रेष्ठ भाषा तथा वैज्ञानिक भाषा है जैसी बोली जाती है वैसी ही लिखी जाती है। सीखने वालों के लिए भी सहज और सरल भाषा है इसलिए हिंदी की लोकप्रियता दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। हिंदी भाषा का साहित्य और व्याकरण समृद्ध है जिसका विकास मध्यकाल में हुआ था। हिंदी कई बोलियों जैसे भोजपुरी, अवधी, हरियाणवी और राजस्थानी की भी मातृभाषा है। हिन्दी का व्याकरण हिन्दी भाषा का आधार है, जिसके कारण हिन्दी व्याकरण का व्यवस्थित और व्यापक अध्ययन आवश्यक हो जाता है। हिंदी  व्याकरण में, वाक्य के मूल तत्वों को पाद कहा जाता है। एक पाद एक संज्ञा या क्रिया हो सकता है, या शब्दों का एक समूह वाक्य में एक इकाई के रूप में कार्य कर सकता है। पद हिंदी व्याकरण की सबसे छोटी इकाई है जिसे छोटी इकाइयों में विभाजित नहीं किया जा सकता है। हिन्दी व्याकरण वाणी के आठ भागों को भी पहचानता है, अर्थात्, संज्ञा (संज्...

महादेवी वर्मा का परिचय

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महादेवी वर्मा का परिचय   (क) काव्य संग्रह 1. नीहार-1930 ई. 2. रश्मि – 1932 ई. 3. नीरजा – 1935 ई. 4. सांध्यगीत -1936 ई. 5. दीपशिखा – 1942 ई. 6. सप्तपर्णा – 1960 ई.  ट्रिकः नेहा रानी सादी सप्त  प्रसिद्ध गद्य रचनाएँ – 1. स्मृति की रेखाएँ 2. पथ के साथी 3. शृंखला की कङियाँ 4. अतीत के चलचित्र  (ख) समेकित काव्य संग्रह 1. यामा – 1940 ई. (इसमें नीहार, रश्मि, नीरजा और सांध्यगीत रचनाओं में संगृहीत सभी गीतों को समेकित रूप में एक जगह संकलित कर दिया गया है।) पुरस्कार – 1. इस ’यामा’ रचना के लिए इनको 1982 ई. में ’भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार’ एवं ’मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ प्राप्त हुआ था। 2. ’नीरजा’ रचना के लिए ’सेकसरिया पुरस्कार’ मिला था। विशेष तथ्य – ⇒ महादेवी वर्मा को ‘हिन्दी की विशाल मन्दिर की वीणा पाणी’ कहा जाता है। ⇒ ‘इस वेदना को लेकर उन्होंने हृदय की ऐसी अनुभूतियाँ सामने रखी जो लोकोत्तर है। कहाँ तक वे वास्तविक अनुभूतियाँ है और कहाँ तक अनुभूतियों की रमणीय कल्पना ,यह नहीं कहा जा सकता।’- महादेवी के सन्दर्भ में यह कथन किसका है ? ⇒ आचार्य शुक्ल 1. ये आरंभ में ब्रज भाषा म...

चेतना (कविता)

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कविता - चेतना  कवि - मैथिलीशरण गुप्त कविता का आरंभ  अरे भारत! उठ, आँखें खोल, उड़कर यंत्रों से, खगोल में घूम रहा भूगोल! अवसर तेरे लिए खड़ा है, फिर भी तू चुपचाप पड़ा है। तेरा कर्मक्षेत्र बड़ा है, पल पल है अनमोल। अरे भारत! उठ, आँखें खोल बहुत हुआ अब क्या होना है, रहा सहा भी क्या खोना है? तेरी मिट्टी में सोना है, तू अपने को तोल। अरे भारत! उठ, आँखें खोल दिखला कर भी अपनी माया, अब तक जो न जगत ने पाया; देकर वही भाव मन भाया, जीवन की जय बोल। अरे भारत! उठ, आँखें खोल तेरी ऐसी वसुन्धरा है- जिस पर स्वयं स्वर्ग उतरा है। अब भी भावुक भाव भरा है, उठे कर्म-कल्लोल। अरे भारत! उठ, आँखें खोल धन्यवाद 🙏

खुला आसमान (गीत)

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गीत - खुला आसमान  गीतकार - सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" गीत का आरंभ  बहुत दिनों बाद खुला आसमान निकली है धूप, खुश हुआ जहान दिखी दिशाएँ, झलके पेड़, चरने को चले ढोर--गाय-भैंस-भेड़, खेलने लगे लड़के छेड़-छेड़ लड़कियाँ घरों को कर भासमान। लोग गाँव-गाँव को चले, कोई बाजार, कोई बरगद के पेड़ के तले जाँघिया-लँगोटा ले, सँभले, तगड़े-तगड़े सीधे नौजवान। पनघट में बड़ी भीड़ हो रही, नहीं ख्याल आज कि भीगेगी चूनरी, बातें करती हैं वे सब खड़ी, चलते हैं नयनों के सधे बाण। धन्यवाद  🙏

विचार आते है (कविता)

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कविता - विचार आते हैं  कवि - गजानन माधव मुक्तिबोध कविता का आरंभ  विचार आते हैं लिखते समय नहीं बोझ ढोते वक़्त पीठ पर सिर पर उठाते समय भार परिश्रम करते समय चांद उगता है व पानी में झलमलाने लगता है हृदय के पानी में विचार आते हैं लिखते समय नहीं पत्थर ढोते वक़्त पीठ पर उठाते वक़्त बोझ साँप मारते समय पिछवाड़े बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त पत्थर पहाड़ बन जाते हैं नक्शे बनते हैं भौगोलिक पीठ कच्छप बन जाती है समय पृथ्वी बन जाता है धन्यवाद 🙏

दोनों ओर प्रेम पलता है(कविता)

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कविता - दोनों ओर प्रेम पलता है  कवि - मैथिलीशरण गुप्त कविता का आरंभ  दोनों ओर प्रेम पलता है। सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है! सीस हिलाकर दीपक कहता-- ’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’ पर पतंग पड़ कर ही रहता  कितनी विह्वलता है! दोनों ओर प्रेम पलता है। बचकर हाय! पतंग मरे क्या? प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या? जले नही तो मरा करे क्या? क्या यह असफलता है! दोनों ओर प्रेम पलता है। कहता है पतंग मन मारे-- ’तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे, क्या न मरण भी हाथ हमारे? शरण किसे छलता है?’ दोनों ओर प्रेम पलता है। दीपक के जलने में आली, फिर भी है जीवन की लाली। किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली, किसका वश चलता है? दोनों ओर प्रेम पलता है। जगती वणिग्वृत्ति है रखती, उसे चाहती जिससे चखती; काम नहीं, परिणाम निरखती। मुझको ही खलता है। दोनों ओर प्रेम पलता है। धन्यवाद 🙏

साहित्यशास्त्र के प्रमुख भारतीय सिद्धांत

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साहित्यशास्त्र के सिद्धांत भारतीय सिद्धांत                    प्रवर्त्तक  रस                         आचार्य भरत अलंकार                  आचार्य भामह  रीति                        आचार्य वामन  ध्वनि                       आनंदवर्धन  वक्रोक्ति                    कुंतक औचित्य                    क्षेमैंद्र उत्पत्तिवाद                भट्ट लोल्लट अनुमतिवाद               आचार्य शंकुक भुक्तिवाद या भोगवाद   आचार्य भट्टनायक अभिव्यक्तिवाद            अभिनवगुप्त छायावाद  ...

कदम मिलाकर चलना होगा (कविता)

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कविता - कदम मिलाकर चलना होगा कवि - अटल बिहारी बाजपेई कविता हुई का आरंभ  बाधाएं आती हैं आएं घिरें प्रलय की घोर घटाएं, पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं, निज हाथों में हंसते-हंसते, आग लगाकर जलना होगा. कदम मिलाकर चलना होगा हास्य-रूदन में, तूफानों में, अगर असंख्यक बलिदानों में, उद्यानों में, वीरानों में, अपमानों में, सम्मानों में, उन्नत मस्तक, उभरा सीना, पीड़ाओं में पलना होगा कदम मिलाकर चला होगा उजियारे में, अंधकार में, कल कहार में, बीच धार में, घोर घृणा में, पूत प्यार में, क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में, जीवन के शत-शत आकर्षक, अरमानों को ढलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ, प्रगति चिरंतन कैसा इति अब, सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ, असफल, सफल समान मनोरथ, सब कुछ देकर कुछ न मांगते, पावस बनकर ढलना होगा कदम मिलाकर चलना होगा कुछ कांटों से सज्जित जीवन, प्रखर प्यार से वंचित यौवन, नीरवता से मुखरित मधुबन, परहित अर्पित अपना तन-मन, जीवन को शत-शत आहुति में, जलना होगा, गलना होगा क़दम मिलाकर चलना होगा धन्यवाद 🙏

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद (कविता)

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कविता -रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद  कवि - रामधारी सिंह "दिनकर" कविता का आरंभ  रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,  आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!  उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,  और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।  जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?  मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;  और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी  चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।  आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का; आज उठता और कल फिर फूट जाता है; किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?  बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।  मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली,  देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू?  स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?  आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू? मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,  आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,  और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की,  इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ।  मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी  कल्पना की जीभ में भी धार होती है,  वाण ही होत...

हाँ दोस्त (कविता)

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कविता- हाँ, दोस्त  कवि-  अज्ञेय   कविता का आरंभ  तुम ने पहाड़ की पगडंडी चुनी और मैं ने सागर की लहर। पहाड़ की पगडंडी : सँकरी, पथरीली, ढाँटी,पर स्पष्ट लक्ष्य की ओर जाती हुई : मातबर और भरोसेदार पगडंडी जो एक दिन निश्चय तुम्हें पड़ाव पर पहुँचा देगी। सागर की लहर विशाल, चिकनी, सपाट पर बिछलती फिसलती हमेशा अज्ञात अदृश्य को टेरती हुई, बेभरोस और आवारा... लहर जो न कभी कहीं पहुँचेगी न पहुँचाएगी न पहुँचने देगी, जो डुबोएगी नहीं तो वहीं लौटा लाएगी जहाँ से चले थे, सिवा इस के कि वह वहीं तब तक नहीं रह गया होगा। ठीक है, दोस्त मैं ने लहर चुनी तुम ने पगडंडी : तुम अपनी राह पर सुख से तो हो? जानते तो हो कि कहाँ हो? मैं-मैं मानता हूँ कि इतना ही बहुत है कि अभी जानता हूँ कि आशीर्वाद में हूँ-जियो, मेरे दोस्त, जियो, जियो, जियो  धन्यवाद 🙏

भोलाराम का जीव

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व्यंग्य कहानी - भोलाराम   का जीव कहानीकार - स्वर्गीय श्री हरिशंकर परसाई कहानी का आरंभ  ऐसा कभी नहीं हुआ था। धर्मराज लाखों वर्षो से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग और नरक में निवास-स्थान अलाट करते आ रहे थे। पर ऐसा कभी नहीं हुआ था। सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर देख रहे थे। गलती पकड में ही नहीं आरही थी। आखिर उन्होंने खीझकर रजिस्टर इतनी ज़ोरों से बन्द किया कि मख्खी चपेट में आगई। उसे निकालते हुए वे बोले, ''महाराज, रिकार्ड सब ठीक है। भोलाराम के जीव ने पांच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना हुआ, पर अभी तक यहां नहीं पहुंचा।'' धर्मराज ने पूछा, ''और वह दूत कहां है?'' ''महाराज, वह भी लापता है।'' इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बडा बदहवास-सा वहां आया। उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत होगया था। उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे, ''अरे तू कहां रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहां है?'' यमदूत हाथ जोडक़र बोला, ...

चाँदनी चुपचाप सारी रात (कविता)

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कविता - चाँदनी चुपचाप सारी रात कवि - अज्ञेय कविता का आरंभ  चाँदनी चुपचाप सारी रात- सूने आँगन में जाल रचती रही । मेरी रूपहीन अभिलाषा अधूरेपन की मद्धिम- आँच पर तचती रही । व्यथा मेरी अनकही आनन्द की सम्भावना के मनश्चित्रों से परचती रही । मैं दम साधे रहा मन में अलक्षित आँधी मचती रही । प्रात बस इतना कि मेरी बात सारी रात उघड़ कर वासना का रूप लेने से बचती रही । धन्यवाद 🙏

अमृतसर आ गया है

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कहानी - अमृतसर आ गया है कहानीकार - भीष्म साहनी  विषय- साम्प्रदायिकता की समस्या  विभाजन की त्रासदी  अमानवीय कृत्यों का दर्शन  मानवीय संवेदना  कहानी का आरंभ  गाड़ी के डिब्बे में बहुत मुसाफिर नहीं थे। मेरे सामनेवाली सीट पर बैठे सरदार जी देर से मुझे लाम के किस्से सुनाते रहे थे। वह लाम के दिनों में बर्मा की लड़ाई में भाग ले चुके थे और बात-बात पर खी-खी करके हँसते और गोरे फौजियों की खिल्ली उड़ाते रहे थे। डिब्बे में तीन पठान व्यापारी भी थे, उनमें से एक हरे रंग की पोशाक पहने ऊपरवाली बर्थ पर लेटा हुआ था। वह आदमी बड़ा हँसमुख था और बड़ी देर से मेरे साथवाली सीट पर बैठे एक दुबले-से बाबू के साथ उसका मजाक चल रहा था। वह दुबला बाबू पेशावर का रहनेवाला जान पड़ता था क्योंकि किसी-किसी वक्त वे आपस में पश्तो में बातें करने लगते थे। मेरे सामने दाईं ओर कोने में, एक बुढ़िया मुँह-सिर ढाँपे बैठा थी और देर से माला जप रही थी। यही कुछ लोग रहे होंगे। संभव है दो-एक और मुसाफिर भी रहे हों, पर वे स्पष्टत: मुझे याद नहीं। गाड़ी धीमी रफ्तार से चली जा रही थी, और गाड़ी में बैठे मुसाफिर ...

जाग तुझको दूर जाना (कविता)

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कविता - जाग तुझको दूर जाना  कवयित्री - महादेवी वर्मा  कविता का आरंभ  चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! जाग तुझको दूर जाना! अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले! या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले; आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छाया जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले! पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना! जाग तुझको दूर जाना! बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले? पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले? विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन, क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल दे दल ओस गीले? तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना! जाग तुझको दूर जाना! वज्र का उर एक छोटे अश्रु कण में धो गलाया, दे किसे जीवन-सुधा दो घँट मदिरा माँग लाया! सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या? विश्व का अभिशाप क्या अब नींद बनकर पास आया? अमरता सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना? जाग तुझको दूर जाना! कह न ठंढी साँस में अब भूल वह जलती कहानी, आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी; हार भी तेरी बनेगी माननी जय की पताका, राख क्षणिक पतंग की है अ...

तोड़ती पत्थर (कविता)

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कविता - तोड़ती पत्थर  कवि - निराला कविता का आरंभ  वह तोड़ती पत्थर; देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर- वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार; श्याम तन, भर बंधा यौवन, नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन, गुरु हथौड़ा हाथ, करती बार-बार प्रहार:- सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार। चढ़ रही थी धूप; गर्मियों के दिन,  दिवा का तमतमाता रूप; उठी झुलसाती हुई लू रुई ज्यों जलती हुई भू, गर्द चिनगीं छा गई, प्रायः हुई दुपहर :- वह तोड़ती पत्थर। देखते देखा मुझे तो एक बार उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार; देखकर कोई नहीं, देखा मुझे उस दृष्टि से जो मार खा रोई नहीं, सजा सहज सितार, सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार। एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर, ढुलक माथे से गिरे सीकर, लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा- "मैं तोड़ती पत्थर।" धन्यवाद  🙏

कुकुरमुत्ता (कविता)

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कविता - कुकुरमुत्ता 🍄  कवि - निराला  कविता का आरंभ  एक थे नव्वाब, फ़ारस से मंगाए थे गुलाब। बड़ी बाड़ी में लगाए देशी पौधे भी उगाए रखे माली, कई नौकर गजनवी का बाग मनहर लग रहा था। एक सपना जग रहा था सांस पर तहजबी की, गोद पर तरतीब की। क्यारियां सुन्दर बनी चमन में फैली घनी। फूलों के पौधे वहाँ लग रहे थे खुशनुमा। बेला, गुलशब्बो, चमेली, कामिनी, जूही, नरगिस, रातरानी, कमलिनी, चम्पा, गुलमेंहदी, गुलखैरू, गुलअब्बास, गेंदा, गुलदाऊदी, निवाड़, गन्धराज, और किरने फ़ूल, फ़व्वारे कई, रंग अनेकों-सुर्ख, धनी, चम्पई, आसमानी, सब्ज, फ़िरोज सफ़ेद, जर्द, बादामी, बसन्त, सभी भेद। फ़लों के भी पेड़ थे, आम, लीची, सन्तरे और फ़ालसे। चटकती कलियां, निकलती मृदुल गन्ध, लगे लगकर हवा चलती मन्द-मन्द, चहकती बुलबुल, मचलती टहनियां, बाग चिड़ियों का बना था आशियाँ। साफ़ राह, सरा दानों ओर, दूर तक फैले हुए कुल छोर, बीच में आरामगाह दे रही थी बड़प्पन की थाह। कहीं झरने, कहीं छोटी-सी पहाड़ी, कही सुथरा चमन, नकली कहीं झाड़ी। आया मौसिम, खिला फ़ारस का गुलाब, बाग पर उसका पड़ा था रोब-ओ-दाब; वहीं गन्दे में उगा देता हुआ ब...

आज मैं अकेला हूँ(कविता)

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कविता-आज मैं अकेला हूँ  कवि त्रिलोचन  कविता का आरंभ  आज मैं अकेला हूँ अकेले रहा नहीं जाता। जीवन मिला है यह रतन मिला है यह धूल में कि फूल में मिला है तो मिला है यह मोल-तोल इसका अकेले कहा नहीं जाता सुख आये दुख आये दिन आये रात आये फूल में कि धूल में आये जैसे जब आये सुख दुख एक भी अकेले सहा नहीं जाता चरण हैं चलता हूँ चलता हूँ चलता हूँ फूल में कि धूल में चलता मन चलता हूँ ओखी धार दिन की अकेले बहा नहीं जाता। धन्यवाद  🙏

उनका हो जाता हूँ (कविता)

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कविता - उनका हो जाता हूँ कवि - त्रिलोचन  चोट जभी लगती है तभी हँस देता हूँ देखनेवालों की आँखें उस हालत में देखा ही करती हैं आँसू नहीं लाती हैं और जब पीड़ा बढ़ जाती है बेहिसाब तब जाने-अनजाने लोगों में जाता हूँ उनका हो जाता हूँ हँसता हँसाता हूँ। धन्यवाद 🙏

इन्स्पेक्टर मातादीन चाँद पर

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कहानी- इन्स्पेक्टर मातादीन चाँद पर कहानीकार- हरिशंकर परसाई  पात्र- मातादीन, गृहमंत्री, सचिव, पुलिसवाला, कोतवाल, मुंशी अब्दुल गफुर, बलभद्र विषय- व्यंग्यात्मक कहानी  भ्रष्टाचारी पुलिस यंत्रणा  निर्दोष को सजा  विज्ञान और वैज्ञानिक को नकारना अंधा कानून  अकार्यक्षम पुलिस यंत्रणा  वेतन पर बहस  स्वच्छ और सक्षम प्रशासन का रहस्य  पुलिस प्रशासन पर व्यंग्य  कहानी का आरंभ  वैज्ञानिक कहते हैं ,चाँद पर जीवन नहीं है. सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर मातादीन (डिपार्टमेंट में एम. डी. साब) कहते हैं- वैज्ञानिक झूठ बोलते हैं, वहाँ हमारे जैसे ही मनुष्य की आबादी है.  विज्ञान ने हमेशा इन्स्पेक्टर मातादीन से मात खाई है. फिंगर प्रिंट विशेषज्ञ कहता रहता है- छुरे पर पाए गए निशान मुलजिम की अँगुलियों के नहीं हैं. पर मातादीन उसे सजा दिला ही देते हैं.  मातादीन कहते हैं, ये वैज्ञानिक केस का पूरा इन्वेस्टीगेशन नहीं करते. उन्होंने चाँद का उजला हिस्सा देखा और कह दिया, वहाँ जीवन नहीं है. मैं चाँद का अँधेरा हिस्सा देख कर आया हूँ. वहाँ मनुष्य जाति है. यह बात सही...

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