स्कूल शिक्षा का भविष्य

स्कूल शिक्षा का भविष्य तकनीकी विकास, सामाजिक परिवर्तनों और वैश्विक बदलावों के कारण बहुत ही रोमांचक और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। कुछ प्रमुख बदलाव जो आने वाले समय में हो सकते हैं, वे इस प्रकार हैं: प्रौद्योगिकी का उपयोग : डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन शिक्षा, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का स्कूल शिक्षा में एक महत्वपूर्ण स्थान होगा। बच्चों को इंटरेक्टिव, कस्टमाइज्ड और पर्सनलाइज्ड शिक्षा मिल सकेगी। स्मार्ट क्लासरूम, ई-लर्निंग, और आभासी कक्षाएं एक सामान्य तरीका बन सकती हैं। कौशल आधारित शिक्षा : भविष्य में शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यावसायिक कौशल, समस्या सुलझाने की क्षमता, और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देना होगा। ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किए जाएंगे जो जीवन कौशल, संवाद कौशल, और प्रौद्योगिकियों के बारे में गहरे ज्ञान को शामिल करेंगे। समावेशी और व्यक्तिगत शिक्षा : शिक्षा में विविधता और समावेशिता पर जोर दिया जाएगा, ताकि सभी छात्रों को उनकी क्षमता के अनुसार शिक्षा मिल सके। इससे बच्चों के शैक्षिक और मानसिक विकास में मदद मिलेगी, चाहे वे किसी भी सामाजिक या भौगोलिक पृष्...

राही (सुभद्रा कुमारी चौहान)

राही


लेखिका-सुभद्रा कुमारी चौहान 

पात्र- अनीता (समाजसुधारक), राही (चोरी के कारण जेल में)

विषय- गरीबी का चित्रण, गरीबी की विवशता, देश की दरिद्रता, राष्टभक्ति और सत्ताभक्ति, मानवीयता का सबसे धर्म, स्त्री वेदना  की झलक

कहानी का आरंभ 

तेरा नाम क्या है? 
राही तुम्हें किस अपराध में सजा हुई? 
चोरी की थी सरकार। चोरी?
क्या चुराया था?
नाज की गठरी। 
कितना अनाज था? 
होगा पाँच छह सेर। 
और सजा कितने दिन की है? 
साल भर की। 
तो तूने चोरी क्यों की? 
 मजदूरी करती तब भी दिन भर में तीन-चार आने पैसे मिल जाते। हमें मजदूरी नहीं मिलती सरकार। हमारी जाति माँगरोरी है। हम केवल मांगते-खाते है। और भीख न मिले तो? तो फिर चोरी करते है। उस दिन घर में खाने को नहीं था। बच्चे भूख से तड़प रहे थे। बाजार में बहुत देर तक माँगा। बोझा ढ़ोने के लिए टोकरा लेकर भी बैठी रही। पर कुछ नही मिला। सामने किसी का बच्चा रो रहा था। उसे देखकर मुझे अपने भूखे बच्चे की याद आ गई। वहीं पर किसी की अनाज की गठरी रखी हुई थी। उसे लेकर अभी भाग ही रही थी कि पुलिस ने पकड़ लिया। अनीता- फिर तूने कहा नहीं कि बच्चे भूखे थे, इसलिए चोरी की। संभव है इस बात से मजिस्ट्रेट कम सजा देता। राही- हम गरीबों की कोई नहीं सुनता सरकार! बच्चे आये थे। कचहरी में मैंने सब कुछ कहा, पर किसी ने नहीं सुना। अनीता- “अब तेरे बच्चे किसके पास है? 
उसका बाप है?” 
 राही- “उसका बाप मर गया सरकार!” जेल में उसे मारा था। और वही अस्पताल में वह मर गया। अब बच्चों का कोई नहीं है। 
अनीता- तो तेरे बच्चों का बाप भी जेल में ही मरा। 
वह क्यों जेल आया था?
राही- उसे तो बिना कसूर के ही पकड़ लिया था। सरकार ताड़ी पीने को गया था। दो चार दोस्त उसके साथ थे। मेरे घर वालों का एक वक्त पुलिस वाले के साथ झगड़ा हो गया था। उसी का उसने बदला लिया। 109 में उसका चलान करके साल भर की सजा दिला दी वहीं मर गया। अनीता- अच्छा जा अपना काम कर। अनीता सत्याग्रह करके जेल में आई थी। पाहिले उसे ‘बी’ क्लास दिया गया था। फिर उसके घरवालों ने लिखा-पढ़ी करके उसे ‘ए’ क्लास में दिलवा दिया। अनीता के सामने एक प्रश्न था? वह सोच रही थी, देश की दरिद्रता और इन निरीह गरीबों के कष्टों को दूर करने का कोई उपाय नहीं है? हम सभी पमात्मा के संतान हैं। एक ही देश के निवासी कम से कम हम सबको खाने-पहनने का सामान अधिकार तो है ही? फिर यह क्या बात है कि कुछ लोग तो बहुत आराम करते है और कुछ लोग पेट के अन्न के लिए चोरी करते हैं? उसके बाद विचारक के अदूरदर्शिता के कारण या सरकारी वकील के चातुर्यपूर्ण ज़िरह के कारण छोटे-छोटे बच्चों की माताएँ जेल भेज दी जाती है। उनके बच्चे भूखों मरने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। एक ओर तो यह कैदी है, जो जेल आकर सचमुच जेल जीवन के कष्ट उठाती है, और दूसरी ओर हम लोग जो अपनी देशभक्ति का ढिंढोरा पिटते हुए जेल आते हैं। हमें आमतौर से दूसरे कैदियों के मुकाबले अच्छा वर्ताव किया जाता है, फिर भी हमें संतोष नहीं होता। हम जेल आकर ‘ए’ और ‘बी’ क्लास के लिए झगड़ते हैं। जेल आकर ही हम कौन सा बड़ा त्याग कर देते हैं? जेल में हमें कौन सा कष्ट रहता है? सिवा इसके कि हमारे माथे पर नेतृत्व का सील लग जाता है। हम बड़े अभिमान के साथ कहते हैं, यह हमारी चौथी जेल यात्रा है। यह हमारी पांचवी जेल यात्रा है। अपनी जेल यात्रा के किस्से बार-बार सुना-सुनाकर आत्म गौरव अनुभव करते हैं; तात्पर्य यह है कि हम जितने बार जेल जा चुके होते है, उतनी ही सीढ़ी हम देशभक्ति और त्याग से दूसरों से ऊपर उठ जाते हैं। इसके बल पर जेल से छूटने के बाद, कोग्रेस को राजकीय सत्ता मिलते ही हम मिनिस्टर, स्थानीय संस्थाओं के मेंबर और क्या-क्या हो जाते हैं। अनीता सोच रही थी, कल तक तो खद्दर भी नहीं पहनते थे, बात-बात पर काँग्रेस का मजाक उड़ाते थे, काँग्रेस के हाथों में थोड़ी शक्ति आते ही वे काँग्रेस भक्त बन गए। खद्दर पहनने लगे, यहाँ तक कि जेल में भी दिखाई पड़ने लगे। वास्तव में यह देश भक्ति है या सत्ताभक्ति! अनीता की आत्मा बोल उठी वास्तव में सच्ची देश भक्ति तो इन गरीबों के कष्ट निवारण में है। ये कोई दूसरे नहीं हैं, हमारी ही भारत माता की संतानें है। इन हजारों लाखों भूखे-नंगे भाई-बहनों की यदि हम कुछ भी सेवा कर सके तो सचमुच हमने अपने देश की सेवा की है। हमारा वास्तविक जीवन तो देहातों में ही है। किसानों की दुर्दशा से हम सभी थोड़े-बहुत परिचित हैं, पर इन गरीबों के पास न घर है न द्वार। अशिक्षा और अज्ञानता का इतना पर्दा इनकी आँखों पर है कि होश सँभालते ही माता पुत्री को और सास बहू को चोरी की शिक्षा देती है। और उनका यह विश्वास है कि चोरी करना और भीख मांगना ही उनका काम है। इससे अच्छा जीवन विताने की वह कल्पना ही नहीं कर सकते। आज यहाँ डेरा डाले तो कल कहीं और चोरी की। बचे तो बचे, नहीं तो फिर दो साल के लिए जेल। क्या मानव जीवन का यही लक्ष्य है? लक्ष्य है भी अथवा नहीं? यदि नहीं है तो विचारादर्श की उच्च सतह पर टिके हुए हमारे जन-नायकों और युग-पुरुषों की हमें क्या आवश्यकता? इतिहास धर्म-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान का कोई अर्थ नहीं होता? पर जीवन का लक्ष्य है, अवश्य है। संसार की मृग मरीचिका में हम लक्ष्य को भूल जाते हैं। सतह के ऊपर तक पहुँच पानेवाली कुछेक महान आत्माओं को छोड़कर सारा जन-समुदाय संसार में अपने को खोया हुआ पाता है, कर्तव्याकर्तव्य का उसे ध्यान नहीं, सत्यासत्य की समझ नहीं, अन्यथा मानवीयता से बढ़कर कौन-सा मानव धर्म है? पतित मानवता को जीवन-दान देने की अपेक्षा भी कोई महतर पुण्य है? राही जैसी कोई भोली-भाली किन्तु गुमराह आत्माओं के कल्याण की साधना होनी चाहिये। सत्याग्रही की यही प्रथम प्रतिज्ञा क्यों न हो? देशभक्ति का यही मापदंड क्यों न बने? अनीता दिन भर इन्हीं विचारों में डूबी रही। शाम को वह इसी प्रकार कुछ सोचते-सोचते सो गई। रात में उसने सपना देखा कि जेल से छुटकर वह इन्हीं माँगरोरी लोगों के गाँव में पहुँच गई है। वहाँ उसने एक छोटा सा आश्रम खोल दिया है। उसी आश्रम में एक तरफ छोटे-छोटे बच्चे पढ़ते हैं और स्त्रियाँ सूत काटती हैं। दूसरी तरफ मर्द कपड़ा बुनते हैं और रुई धुनते हैं। शाम को रोज उन्हें धार्मिक पुस्तक पढ़कर सुनाई जाती है और देश में कहाँ क्या हो रहा है, यह सब सरल भाषा में समझाया जाता है। वही भीख मांगने और चोरी करने वाले लोग अब आदर्श ग्रामवासी हो रहे हैं। रहने के लिए उन्होंने छोटे-छोटे अपना घर बना लिए हैं। राही के अनाथ बच्चों को अनीता अपने साथ रखने लगी है। अनीता यही सुख स्वप्न देख रही थी। सुबह सात बजे तक उसकी नींद नहीं खुली। अचानक एक स्त्री जेलर ने उसे आकर जगा दिया और बोली- आपके पिता बीमार हैं। आप बिना शर्त छोड़ी जा रही हैं। अनीता अपने स्वप्न को सच्चाई में परिवर्तित करने की एक मधुर कल्पना ले घर चली गई। इस कहानी के माध्यम से सुभद्रा कुमारी चौहान यह सन्देश देती हैं कि गरीबों के कल्याण के बिना सत्याग्रहियों का देशभक्ति सत्ताभक्ति ही कहालाएगी। वास्तव में सच्ची देश भक्ति तो गरीबों के कष्ट निवारण में है। गुमराह लोगों को सही रास्ते पर लाने का प्रयास है। मानवीयता ही हमारा सबसे बड़ा धर्म है।

धन्यवाद 🙏

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