स्कूल शिक्षा का भविष्य

स्कूल शिक्षा का भविष्य तकनीकी विकास, सामाजिक परिवर्तनों और वैश्विक बदलावों के कारण बहुत ही रोमांचक और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। कुछ प्रमुख बदलाव जो आने वाले समय में हो सकते हैं, वे इस प्रकार हैं: प्रौद्योगिकी का उपयोग : डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन शिक्षा, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का स्कूल शिक्षा में एक महत्वपूर्ण स्थान होगा। बच्चों को इंटरेक्टिव, कस्टमाइज्ड और पर्सनलाइज्ड शिक्षा मिल सकेगी। स्मार्ट क्लासरूम, ई-लर्निंग, और आभासी कक्षाएं एक सामान्य तरीका बन सकती हैं। कौशल आधारित शिक्षा : भविष्य में शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यावसायिक कौशल, समस्या सुलझाने की क्षमता, और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देना होगा। ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किए जाएंगे जो जीवन कौशल, संवाद कौशल, और प्रौद्योगिकियों के बारे में गहरे ज्ञान को शामिल करेंगे। समावेशी और व्यक्तिगत शिक्षा : शिक्षा में विविधता और समावेशिता पर जोर दिया जाएगा, ताकि सभी छात्रों को उनकी क्षमता के अनुसार शिक्षा मिल सके। इससे बच्चों के शैक्षिक और मानसिक विकास में मदद मिलेगी, चाहे वे किसी भी सामाजिक या भौगोलिक पृष्...

सतपुड़ा के जंगल (कविता)

कविता- सतपुड़ा के जंगल

कवि- भवानीप्रसाद मिश्र

प्रकाशन व संकलन - गीत-फरोश १९५६ व दूसरा तार सप्तक में। 

कविता का आरंभ 

सतपुड़ा के घने जंगल 

नींद में डूबे हुए-से, 

ऊँघते अनमने जंगल। 

झाड़ ऊँचे और नीचे 

चुप खड़े हैं आँख भींचे;

घास चुप है, काश चुप है 

मूक शाल, पलाश चुप है; 

बन सके तो धँसो इनमें, 

धँस न पाती हवा जिनमें, 

सतपुड़ा के घने जंगल 

नींद में डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

सड़े पत्ते, गले पत्ते, 

हरे पत्ते, जले पत्ते, 

वन्य पथ को ढँक रहे-से 

पंक दल में पले पत्ते, 

चलो इन पर चल सको तो, 

दलो इनको दल सको तो, 

ये घिनौने-घने जंगल, 

नींद में डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

अटपटी उलझी लताएँ, 

डालियों को खींच खाएँ, 

पैरों को पकड़ें अचानक, 

प्राण को कस लें कपाएँ, 

साँप-सी काली लताएँ 

बला की पाली लताएँ, 

लताओं के बने जंगल, 

नींद में डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

मकड़ियों के जाल मुँह पर,

और सिर के बाल मुँह पर, 

मच्छरों के दंश वाले, 

दाग़ काले-लाल मुँह पर, 

बात झंझा वहन करते, 

चलो इतना सहन करते, 

कष्ट से ये सने जंगल, 

नींद मे डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

अजगरों से भरे जंगल 

अजगरों से भरे जंगल 

अगम, गति से परे जंगल, 

सात-सात पहाड़ वाले, 

बड़े-छोटे झाड़ वाले, 

शेर वाले बाघ वाले, 

गरज और दहाड़ वाले, 

कंप से कनकने जंगल, 

नींद मे डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

इन वनों के ख़ूब भीतर, 

सतपुड़ा के घने जंगल 

नींद में डूबे हुए-से, 

ऊँघते अनमने जंगल। 

झाड़ ऊँचे और नीचे 

चुप खड़े हैं आँख भींचे; 

घास चुप है, काश चुप है 

मूक शाल, पलाश चुप है; 

बन सके तो धँसो इनमें, 

धँस न पाती हवा जिनमें, 

सतपुड़ा के घने जंगल 

नींद में डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

सड़े पत्ते, गले पत्ते, 

हरे पत्ते, जले पत्ते, 

वन्य पथ को ढँक रहे-से 

पंक दल में पले पत्ते, 

चलो इन पर चल सको तो, 

दलो इनको दल सको तो, 

ये घिनौने-घने जंगल, 

नींद में डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

अटपटी उलझी लताएँ, 

डालियों को खींच खाएँ, 

पैरों को पकड़ें अचानक, 

प्राण को कस लें कपाएँ, 

साँप-सी काली लताएँ 

बला की पाली लताएँ, 

लताओं के बने जंगल, 

नींद में डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

मकड़ियों के जाल मुँह पर, 

और सिर के बाल मुँह पर, 

मच्छरों के दंश वाले, 

दाग़ काले-लाल मुँह पर, 

बात झंझा वहन करते, 

चलो इतना सहन करते, 

कष्ट से ये सने जंगल, 

नींद मे डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

अजगरों से भरे जंगल 

अगम, गति से परे जंगल, 

सात-सात पहाड़ वाले, 

बड़े-छोटे झाड़ वाले, 

शेर वाले बाघ वाले, 

गरज और दहाड़ वाले, 

कंप से कनकने जंगल, 

नींद मे डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

इन वनों के ख़ूब भीतर, 

चार मुर्ग़े, चार तीतर, 

पाल कर निश्चिंत बैठे, 

विजन वन के बीच बैठे, 

झोंपड़ी पर फूस डाले 

गोंड तगड़े और काले 

जब कि होली पास आती, 

सरसराती घास गाती, 

और महुए से लपकती, 

मत्त करती बास आती, 

गूँज उठते ढोल इनके, 

गीत इनके गोल इनके। 

सतपुड़ा के घने जंगल 

नींद मे डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

जगते अँगड़ाइयों में, 

खोह खड्डों खाइयों में 

घास पागल, काश पागल, 

शाल और पलाश पागल, 

लता पागल, वात पागल, 

डाल पागल, पात पागल, 

मत्त मुर्ग़े और तीतर, 

इन वनों के ख़ूब भीतर। 

क्षितिज तक फैला हुआ-सा, 

मृत्यु तक मैला हुआ-सा 

क्षुब्ध काली लहर वाला, 

मथित, उत्थित ज़हर वाला, 

मेरु वाला, शेष वाला, 

शंभु और सुरेश वाला, 

एक सागर जानते हो? 

ठीक वैसे घने जंगल, 

नींद मे डूबे हुए-से 

ऊँघते अनमने जंगल। 

धँसो इनमें डर नहीं है, 

मौत का यह घर नहीं है, 

उतर कर बहते अनेकों, 

कल-कथा कहते अनेकों, 

नदी, निर्झर और नाले, 

इन वनों ने गोद पाले, 

लाख पंछी, सौ हिरन-दल, 

चाँद के कितने किरन दल, 

झूमते बनफूल, फलियाँ, 

खिल रहीं अज्ञात कलियाँ, 

हरित दूर्वा, रक्त किसलय, 

पूत, पावन, पूर्ण रसमय, 

सतपुड़ा के घने जंगल 

लताओं के बने जंगल। 

निष्कर्ष -  इस कविता में प्रकृति का चित्रण है। 

जंगल के सौंदर्य का वर्णन किया है। 

जंगल का कष्टदायक सफर पूरा करने का अनुभव। 

कवि ने चुनौती दी है कविता के माध्यम से। 

गोंड जाति के लोगों का वर्णन। 

सतपुड़ा के जंगल का बरीकी से वर्णन किया है कविता में। 

धन्यवाद 🙏



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