स्कूल शिक्षा का भविष्य

स्कूल शिक्षा का भविष्य तकनीकी विकास, सामाजिक परिवर्तनों और वैश्विक बदलावों के कारण बहुत ही रोमांचक और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। कुछ प्रमुख बदलाव जो आने वाले समय में हो सकते हैं, वे इस प्रकार हैं: प्रौद्योगिकी का उपयोग : डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन शिक्षा, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का स्कूल शिक्षा में एक महत्वपूर्ण स्थान होगा। बच्चों को इंटरेक्टिव, कस्टमाइज्ड और पर्सनलाइज्ड शिक्षा मिल सकेगी। स्मार्ट क्लासरूम, ई-लर्निंग, और आभासी कक्षाएं एक सामान्य तरीका बन सकती हैं। कौशल आधारित शिक्षा : भविष्य में शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यावसायिक कौशल, समस्या सुलझाने की क्षमता, और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देना होगा। ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किए जाएंगे जो जीवन कौशल, संवाद कौशल, और प्रौद्योगिकियों के बारे में गहरे ज्ञान को शामिल करेंगे। समावेशी और व्यक्तिगत शिक्षा : शिक्षा में विविधता और समावेशिता पर जोर दिया जाएगा, ताकि सभी छात्रों को उनकी क्षमता के अनुसार शिक्षा मिल सके। इससे बच्चों के शैक्षिक और मानसिक विकास में मदद मिलेगी, चाहे वे किसी भी सामाजिक या भौगोलिक पृष्...

कविता -जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे

कविता -जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे 

कवि - रामधारी सिंह "दिनकर"
कविता का आरंभ 

वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा सम्भालो, 

चट्टानों की छाती से दूध निकालो, 

है रुकी जहाँ भी धार, शिलाएँ तोड़ो, 

पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो । 

चढ़ तुँग शैल शिखरों पर सोम पियो रे ! 

योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे ! 

जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है, 

चिनगी बन फूलों का पराग जलता है, 

सौन्दर्य बोध बन नई आग जलता है, 

ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है । 

अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे ! 

गरजे कृशानु तब कँचन शुद्ध करो रे ! 

जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है, 

भामिनी वही तरुणी, नर वही तरुण है, 

है वही प्रेम जिसकी तरँग उच्छल है, 

वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है । 

उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है, 

तलवार प्रेम से और तेज होती है ! 

छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए, 

मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाए, 

दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है, 

मरता है जो एक ही बार मरता है । 

तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे ! 

जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे ! 

स्वातन्त्रय जाति की लगन व्यक्ति की धुन है, 

बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है !

वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे 

जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे! 

जब कभी अहम पर नियति चोट देती है, 

कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है, 

नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है, 

वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है । 

चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे ! 

धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे ! 

उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है, 

सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है, 

विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिन्तन है, 

जीवन का अन्तिम ध्येय स्वयं जीवन है । 


सबसे स्वतन्त्र रस जो भी अनघ पिएगा ! 

पूरा जीवन केवल वह वीर जिएगा !

धन्यवाद 🙏

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