स्कूल शिक्षा का भविष्य

स्कूल शिक्षा का भविष्य तकनीकी विकास, सामाजिक परिवर्तनों और वैश्विक बदलावों के कारण बहुत ही रोमांचक और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। कुछ प्रमुख बदलाव जो आने वाले समय में हो सकते हैं, वे इस प्रकार हैं: प्रौद्योगिकी का उपयोग : डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, ऑनलाइन शिक्षा, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का स्कूल शिक्षा में एक महत्वपूर्ण स्थान होगा। बच्चों को इंटरेक्टिव, कस्टमाइज्ड और पर्सनलाइज्ड शिक्षा मिल सकेगी। स्मार्ट क्लासरूम, ई-लर्निंग, और आभासी कक्षाएं एक सामान्य तरीका बन सकती हैं। कौशल आधारित शिक्षा : भविष्य में शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यावसायिक कौशल, समस्या सुलझाने की क्षमता, और रचनात्मक सोच को बढ़ावा देना होगा। ऐसे पाठ्यक्रम तैयार किए जाएंगे जो जीवन कौशल, संवाद कौशल, और प्रौद्योगिकियों के बारे में गहरे ज्ञान को शामिल करेंगे। समावेशी और व्यक्तिगत शिक्षा : शिक्षा में विविधता और समावेशिता पर जोर दिया जाएगा, ताकि सभी छात्रों को उनकी क्षमता के अनुसार शिक्षा मिल सके। इससे बच्चों के शैक्षिक और मानसिक विकास में मदद मिलेगी, चाहे वे किसी भी सामाजिक या भौगोलिक पृष्...

रिपोर्ताज

रिपोर्ताज


रिपोर्ताज गद्य की अत्याधुनिक विधा है । इसका विकास सन 1936 ईस्वी के बाद द्वितीय विश्व युद्ध के समय पश्चात्य प्रभाव से हुआ ।

रिपोर्ताज में लेखन किसी घटना का विवरण साहित्यिक शैली में इस प्रकार प्रस्तुत करता है कि जिसे पढ़कर पाठक भावविभोर हो जाता है।

हिंदी में रिपोर्ताज विधा के जनक शिवदान सिंह चौहान माने जाते हैं। इनका प्रथम रिपोर्ताज 'लक्ष्मीपुरा', 'रूपाभ' पत्रिका (1938 ई) में प्रकाशित हुआ था।

रिपोर्ताज के प्रचार-प्रसार में 'हंस' पत्रिका का सर्वाधिक योगदान है। इसी पत्रिका में शिवदान सिंह चौहान ने 'मौत के खिलाफ जिंदगी की लड़ाई' शीर्षक रिपोर्ट लिखा था जिसमें स्वतंत्रता पूर्व देश की स्थिति का विवरण है।

'हंस' पत्रिका में 'समाचार और विचार' तथा 'अपना देश' स्तंभों के अंतर्गत विभिन्न लेखकों के रिपोर्ताज प्रकाशित होते रहे। 

'विशाल भारत' में रांगेयराघव के  रिपोर्ताज 'अदम्य जीवन' शीर्षक से प्रकाशित होते थे 

द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में भयंकर अकाल पड़ा और महामारी का प्रकोप भी हुआ। रांगेयराघव भयानक दृश्य को स्वयं देखने गए । वहां उन्होंने क्षुधापीड़ित अकाल/महामारी से मरते हुए नर-नारियों और उनकी विवशता का लाभ उठाते शोषक पूंजीपतियों, व्यवसायियों के अमानवीय कृत्यों को देखा और उन दृश्यों के मार्मिक एवं हृदय विदारक जो 'तूफानों के बीच' शीर्षक से प्रकाशित हुए।

प्रकाशचंद्र गुप्त के 'स्वराज्य भवन', 'अल्मोड़े का बाजार' और 'बंगाल का अकाल' आदि उल्लेखनीय रिपोर्ताज हैं। 

रामनारायण उपाध्याय ने व्यंग्यात्मक शैली में 'गरीब और अमीर पुस्तकें ' नामक रिपोर्ताज की रचना की।

जगदीश चंद्र जैन ने डायरी शैली में रिपोर्ताज लिखे जो 'पेकिंग की डायरी ' नाम से प्रकाशित हुए हैं।

'प्रभाकर जब पाताल गए' (प्रभाकर माचवे), 'कागज की किश्तियाँ', (लक्ष्मीचंद्र जैन), 'मैं छोटानागपुर में हूं' (कामता प्रसाद सिंह), 'देश की मिट्टी बुलाती है' (भदन्त आनंद कौसल्यायन), 'युद्धयात्रा' (धर्मवीर भारती),  'प्लाट का मोर्चा ' (शमशेर बहादुर सिंह)  हिंदी के उल्लेखनीय रिपोर्ताज हैं।

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